इस
जगमगाती रोशनी में मुझे एक अँधेरा दिखता है,
मुझे
दिखता है वो शख्स जो बस रातों में बिकता है.
पहले
से बँटे मेरे इस वतन को
और बाँटने में, इस शाशन तंत्र को NEW INDIA
दिखता है,
ख्वाबी
बुलबुले छोड़ने का हुनर, हमारे वजीर- ए- आजम में साफ़ साफ़ दिखता है.
मुसलसल
कोशिशों के बाद भी इंसा मोहब्बत को ना समझ पाया,
उसे
आज भी मोहब्बत में एक ऊंच नीच का पहरा दिखता है.
वो
छाँव में बैठ धूप की सौदेबाजी करते हैं,
वो
जमीं पे बैठ आसमां को बेचते हैं,
कभी
कभी ऐसे बाजारू लोगों से मुझे खुदा भी डरा हुआ दिखता है.
मुझे
इन बने बनाये कालजई धर्मों में ही सबसे ज्यादा खोट दिखता है,
वजह शायद यही है के काफिरों को ही अंततः भगवान
मिलता है.
मा-
बैन- ए- मन- ओ- तू के बीच अब एक दूरी का एहसास दिखता है,
बेहतर हो के अब मैं अब चल दूं, क्यूंकि मुझे इस
रिश्ते का अंत साफ़ साफ़ दिखता है.
वो
पुराना सा इश्क मेरे हमउम्र नोजवानों में दम तोड़ता सा दिखता है,
बस
एक जिस्मानी चाह रह गयी है, जिसके आगे रूह का दरवाजा इन्हें बंद दिखता है.
एक
शायर है जो हारी हुई कलम से जीत की उम्मीद वाले शब्द लिखता है,
उसे
आने वाला हर कल आज से बेहतर दिखता है.
मैं
जो देख पाया मुझे वो भी दिखता है,
मैं
जो ना देख पाया मुझे वो भी दिखता है,
मैं ही वो हारी हुई कलम वाला शायर हूँ जो बस जीत की उम्मीद वाले शब्द लिखता है.
मा-
बैन- ए- मन- ओ- तू = तेरे मेरे बीच (between you and me )
मुसलसल
= लगातार
-v.p
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