Sunday, 6 December 2015

              तुम क्या हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

ठंडक भरी तन्हा शाम हो ?
या तपते दिन की छाँव हो ?
बेमतलब सी हँसी हो ?
या सिसकियों की नमीं हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

एक आवारा अधूरा ख्याल हो ?
या मुकम्मल हकीक़त हो ?
अदना सा जर्रा भर हो ?
या पूरा जहाँ हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

सारे सवालों का जवाब हो ?
या खुद एक सवाल हो ?
दर्द की आह हो ?
या इन अल्फाजों की वाह हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

तुम “मैं “ भी हो,
तुम “तू” भी हो,
तुम “हम” भी हो,
तुम होके भी नहीं हो,
तुम होके भी हर कहीं हो,

तुम क्या हो ?

शायद तुम इश्क हो .






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Wednesday, 13 May 2015

कौन जाने

कौन जाने किसी बहाने से तुम मुझे पुकारती हो,
मैंने सुना है नींद में तुम तकिये से मुझे मारती हो ।

अरे ऐसी क्या बेबसी की आके थोड़ी चिट चैट ना कर सको,
वाकई जिद्दी हो या बस एवईं रुतबा झाड़ती हो ।

मैं पसंद हूँ तो, ज़रा मुझसे कहो,
ये क्या बार बार नज़रे मिला के मुझे ताड़ती हो ।

इतना भी क्या हिचकिचाना,
मन ही मन चाहना, बस बातें बनाना,
मुझको पता है ये रंग रूप मेरे लिए निखारती हो ।

चलो आज एक बात मैं भी कबूल करता हूँ,
हाँ मैं भी तुम्हें चाहता हूँ बेहद चाहता हूँ,
फिर क्यों नहीं एक बार बहाने की जगह हक़ से मुझे पुकारती हो ।

हर रात छत पे तुम्हारा इंतजार करता हूँ,
क्यों शर्मा जी के लड़के से हँस के बात करके मुझे जलन की कढ़ाई में उतारती हो ।


चलो ना किसी सुबह हम एक दूजे से वो कहें,
जिसे सुनने के बाद दिल में कोई तड़प ना रहे,
फिर देखना बस आने वाला हर लम्हा तुम मेरे साथ गुजारती हो ।

कौन जाने किसी बहाने से तुम मुझे पुकारती हो,
मैंने सुना है नींद में तुम तकिये से मुझे मारती हो ।

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Tuesday, 3 February 2015

The Last Spoon

शायद ये तीन इंसानों का मकान हमेशा से ही ऐसा था. मैंने यहाँ घर इसलिए नहीं कहा क्यूंकि घर को बनानेवाला अपनापन यहाँ इस मकान में दूर – दूर तक कभी था ही नहीं.
तीन इंसान- एक पैंतीस साल का इंसान खुद में गुमनाम, कायर, और स्वार्थी. एक दस साल का इंसान, खुद से कई सवाल पूछने वाला, उलझा हुआ सा. और एक तीस साल की इंसान, आजादी की चाहत रखने वाली, ख्वाब देखने वाली, जुनूनी, पर बन्धनों में बंधी हुई.

पर इस वक़्त इस मकान में बस दो हे इंसान हैं, एक वो जो इस वक़्त खून से लथपथ फर्श पे तड़प रहे मेरे पैंतीस साल के बापू, और एक मैं दस साल का उनका बेटा उनसे तीन हाथ की दूरी पे उकड़ू  बना बैठा.
उनकी आँखों में डर, गुस्सा और मुझसे उम्मीद की मैं उन्हें बचाने की कोशिश करूँगा के एहसास हैं. मेरी आँखों में बस सवाल कई सवाल और शायद, शायद आँखों के किसी कोने में  हल्की सी खुशी. शायद मैं उन्हें बचाने की कोशिश भी करता अगर उनकी आँखों में एक एहसास और होता पश्यताप का, उस तीसरे इंसान के लिए जो इस वक़्त हमारे बीच में नहीं है. वो तीसरा इंसान इस वक़्त हमारे बीच में इसलिए नहीं है क्यूंकि उसने आज अजादी पा ली, अपने जूनून की हद पार करके सारे बंधन तोड़ के ख्वाबों की तरफ चल्दी, वो तीसरी इंसान हैं तीस साल की मेरी माँ.

जब से मेरे अन्दर हल्का फुल्का दिमाग आया है तब से ही मैंने पाया है की मेरे पतले, सांवले रंग के, हल्की मूंछों वाले बापू को गुस्सा बेहद आता है, या सच कहूं तो मुझे ऐसा लगता है की वो एक कमजोर इंसान हैं और अपनी सारी चिढ़ और कमजोरी का सारा रिजल्ट वो मेरी माँ पे निकालते हैं. ये एकदम उस तरह से है जैसे की स्कूल में जब टीचर मुझे मेरी कमजोरी पे डांटती हैं तो मैं खाना ना खा के या माँ से बात ना करके अपना गुस्सा निकलता हूँ.
 मेरे बापू एक एटीएम में काम करते हैं, बापू कहते थे की वहां एटीएम से ढेर सारे लोग ढेर सारा रूपया निकालते हैं, शुरू - शुरू में मुझे लगता था की जब मेरे बापू एटीएम में काम करते हैं तो एटीएम भी उनका होगा और हमारे पास ढेर सारा रूपया होगा, पर जैसा की मैंने कहा की मेरे अन्दर हल्का फुल्का दिमाग आ चूका है तो मुझे जल्दी समझ आ गया था की बापू वहाँ बस रूपया की देखभाल करते हैं.
रोज शाम को सात बजे अपनी साइकिल पे चले जाना, और सवेरे सात बजे वापस नशे में धुत्त आना. शायद वो एटीएम से जायदा खुद की तलब का ख़याल रखने जाते हैं. जब वो आते हैं तब मैं स्कूल जा रहा होता हूँ, मुझे नफरत है उनकी सुबह सुबह की लाल आँखों से. उन आँखों में देख के मानो ऐसा लगता है की उनकी आदतों का एक हिस्सा मेरे अन्दर भी आजायेगा, मैंने पढ़ा था अपने स्कूल की एक दिवार पे की बच्चे माँ बाप की ही छाया होते हैं.
मैं घर से निकल रहा होता हूँ वो घर में घुस रहे होते हैं. हमारी आँखें कुछ देर के लिए मिलती हैं और फिर वो घर के अन्दर और मैं बाहर. मुझे पता है की वो घर में जाते ही क्या करेंगे, माँ रसोई में होंगी और वो आके अपने बदबूदार कपड़ों को इधर उधर फेंक के बस लेट जायंगे और फिर फरमाईश पे फरमाईश. माँ चुप रहती हैं अब, शायद तबसे ही जबसे एक साल पहले की सुबह को पहली बार मेरे सामने बापू ने माँ को फर्श पे लेटा के  मारा था, अपनी बेल्ट से, जूते से या जो भी सामान उनके बीच में आया. शायद बापू की चाय में एक चम्मच चीनी कम थी. मैं उस दिन भी आज की तरह ही उन दोनों से तीन हाथ की दूरी पे उकडू बना बैठा था, माँ का चेहरा याद मुझे, बाल खून से भीगे हुए, आँखों में आंसू अपनी किस्मत और डर को लेके. वो चीख नहीं रही थीं, पता नहीं क्यूँ, मैं तो चिल्लाने लगता हूँ अगर जरा सी चोट आती है तो, पर वो नहीं चीखी शायद शादी के वक़्त उन्हें बताया गया होगा की अपने पति की इज्ज़त का हमेशा मान रखना, भले कुछ भी हो. चीखने से पड़ोसियों को पता चल जाता.
मैं कई दिन तक सोचता रहा की क्या एक चम्मच चीनी इतनी जरूरी होती है.
उस दिन के बाद से ही माँ अब बात नहीं करती बापू से, वो जैसा कहते हैं वो कर देतीं हैं.
ऐसा नहीं की बापू ने पहले कभी हाथ नहीं उठाया होगा, वो हर दुसरे दिन माँ को मरते थे. मुझे हर दुसरे दिन उनके बदन पे नीले निशान नयी नयी जगह दीखते थे, चाहे वो जितना भी छुपाने की कोशिश क्यूँ ना करती. पर शायद उस दिन अपने बड़े होते बेटे के सामने खुद को पीटते हुए देखना उनकी आत्मा को गहरा घाव दे गया था.
उस दिन की मेरी माँ की नज़रों  में उन आंसुओं और डर के साथ एक अजीब सा एहसास था. मैं समझ नहीं पाया था कभी उस एहसास को पर मुझे लगता था की वो एक दिन हकीक़त बनेगा.
और आज वो एहसास हकीक़त बन गया. वो एहसास आज़ादी का था. बेमतलब सी हो चुकी खुद की जिंदगी को कुछ मतलब देने का एहसास.

माँ को पेंटिंग्स का बेहद शौक था. शायद शौक कहना गलत होगा, उन्हें जूनून था, उनकी एक अलग दुनिया थी रंगों की, कल्पना की जिसे वो कभी कभी कागज़, दिवार, या जहाँ भी वो रंगों से सब कुछ कह सके, जो वो किसी से नहीं कहती थी. उन पेंटिंग्स में कह देती थी.
शायद वो ही इकलोती चीज़ थी जो उन्हें हमेशा जिन्दा रखती थी, हमेशा जिंदगी से एक उम्मीद बंधाती थी की आने वाला कल बेहतर होगा.
माँ और मेरी बातें सबसे ज्यादा मेरे स्कूल से आने के बाद खाना खाते वक़्त होती थीं. वो पूरे दिन में मेरा मनपसंद एक घंटा था. क्यूंकि उस पूरे एक घंटे में मैं अपना मनपसंद खाना खाता था, माँ के हाथ के बने दल चावल.
पीली गुनगुनी धूप की तरह  अरहर की दाल, उसमें सफ़ेद मुलायम बादलों की तरह मिले चावल और हरी नरम घास की तरह हरा धनिया. वो आम दल चावल की तरह ही था. पर उसे खाते ही मुझे ऐसा लगता था की मानो मैं किसी हरे मैदान बादल और धूप के साए में अपना मनपसंद गाना गुनगुना रहा हूँ. वो हमेशा पहली चम्मच अपने हाथों से खिलाती थीं और फिर  मुझसे स्कूल के बारे में पूछती थीं. उनकी सबसे ज्यादा दिल्चस्बी मेरी ड्राइंग की क्लास पे रहती थी की आज क्या बनवाया, घर में बनाने को क्या दिया है और अगर कुछ होमवर्क होता तो वो झट से मेरा बैग लेके आती और मेरे होमवर्क में अपने जूनून को उकेरने लगती.
उनका चेहरा उस वक़्त बेहद प्यारा लगता था, मानो उस एक घंटे के लिए उन्हें कुछ याद ना हो और वो अपनी दुनिया में घुमने गयी हों.
कभी कभी जब ड्राइंग में होमवर्क नहीं मिलता तो वो बस चुप  चाप बैठ के बस मुझसे बातें करतीं. ऐसे ही एक दिन मैंने उनसे पुछा था अपना मनपसंद खाना खाते हुए की “माँ आपको ड्राइंग इतनी क्यूँ पसंद है” ?
उन्होंने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा था की “मुझे सबसे ज्यादा प्यार ड्राइंग से ही है, और मैं स्कूल में हमेशा फर्स्ट आती थी. मैं जब उदास होती थी तो बस अपने कमरे में जाके कुछ न कुछ बनाने लगती. छोटी थी तो सारे बच्चे खेलते थे और मैं मिट्टी में कुछ न कुछ बनाती. हमेशा सोचा था की एक दिन सब मेरे बने हुए चित्रों को देखेंगे और मैं दुनिया में नयी नयी जगह जाके और सीखूंगी”
मैंने आखिरी चम्मच को मुह में डालते हुए कहा “तो आप अब क्यूँ नहीं बनातीं” ?
झट से उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा उदास हो गया, उन्होंने कहा “की हमारे समाज में लड़कियों के सपने हकीक़त में पूरे नहीं होते”.
वो कुछ और कहती इससे पहले ही उनका ध्यान मेरी थाली पे गया जो हमेशा की तरह आज भी साफ़ हो गयी.
“अरे और लेके आऊँ ? थोड़ा सा और खा ले”? माँ ने बात बदलते हुए कहा.
मैंने मना कर दिया. वो थाली उठा के धुलने के लिए मुड़ी तो मैंने उनसे कहा की “माँ पर हमारे सर तो कहते हैं की अपने सपनों को कभी हारने मत दो, जब तक सांस है तब तक आस है, उठो, लड़ो, और सपनों के लिए हर वक़्त कुछ करते रहो, वो जरुर पुरे होंगे’.
माँ ने बस इतना कहा की चलो जाके थोड़ा आराम कर लो, मैं कपड़े धुल लूं”.
हमारा एक घंटा खत्म हो गया था.
उनके हर दिन एक जैसे थे, सुबह सबसे जल्दी उठना, खाना बनाना, घर साफ़ करना, मुझे स्कूल भेजना, बापू के आने के बाद उनकी फरमाईशें पूरी करना, कुछ कमी हो तो गालियाँ  सुनना, कपड़े बर्तन धोना, फिर शाम को खाना बनाना, सब कुछ उनके लिए मानो एक जैसा ही हो गया था. शायद ज़्यादातर औरतों की जिंदगी बस उनके पति और बच्चों में सिमट के रह जाती है, अजीब है ये भी.
एक तरफ ये मेरे बापू हैं जो इस वक़्त फर्श पे अपनी आखिरी साँसे ले रहे हैं, हमेशा अपनी ज़िम्मेदारी से भागने वाले. मुझे याद नहीं की कब ये मेरे लिए कुछ तोहफा लेके आये थे, या स्कूल जाते वक़्त प्यार से दो रूपये भी दिए हो, या कभी मुझे समझाया हो, उन्हें तो बस पैसा और शराब ही चाहिए. कभी कभी तो वो पूरी तनख्वाह ही अपने पास रख लेते थे. हमारी जरूरतें पूरी हों या नहीं उन्हें मतलब नहीं.
 मुझे पता था की एक दिन ये सब खत्म होगा, और आज हो भी गया.  सुबह जब मैं स्कूल के लिए निकला था तो माँ की नजरों में मैंने उस आज़ादी के एहसास को हकीक़त में बदलने का जज़्बा देखा था. मुझे पता था की जल्द ही किसी दिन मैं स्कूल से वापस आऊं तो ये मकान मुझे इसी हालत में मिलेगा.
पर वो दिन आज का ही होगा ये नहीं सोचा था.
मेरे मकान के बाहर शोर बढ़ रहा है, शायद लोग जमा हो रहे होंगे, हिंग और खून की गंध कभी छुपती कहाँ है. किसी भी पल लोग आजायेंगे और फिर सामाजिक सवाल और रीती रिवाज शुरू.
मैं जो अबतक उकडू बनके ये सब सोच रहा था तुरंत उठा और रसोई में गया, मुझे चाकू चाहिए था उस अधूरी मौत को पूरा करने के लिए, अब मैं इतना बड़ा तो हो ही गया हूँ.
मैंने चाकू उठाया तो मेरी नज़र गैस के पास रखी थाली पे गयी, जिसमें मेरा मनपसन्द खाना था. माएं भी अजीब होती हैं, वो कुछ भी करें जहाँ भी जायें पर हमेशा ये जरुर सोचती हैं की उनके बच्चे भूखे ना रहे.
एक कागज भी है थाली से दबा. मैं थाली के पास गया, एक चम्मच पहले से ही दाल चावल से भरी रखी थी थाली में, मेरी माँ के हाथ की आखिरी चम्मच, पर सबसे ज्यादा खुबसूरत और बेहतर, क्यूंकि उस आखिरी चम्मच में अजादी की महक थी. मैंने बस वो आखिरी चम्मच खायी.
और उस कागज को थाली के नीचे से निकाला और उसे खोला, चाकू को दूसरे हाथ में लेके मैं अपने अधमरे बापू के पास गया और उनके बगल में जाके बैठ गया, हमारी आँखें मिली, शायद वो समझ गए थे की मैं नहीं बचाऊंगा उन्हें.
हमेशा से ही इतने कमजोर थे ये, मैंने उनके चेहरे को पकड़ के उनकी आँखों के सामने उस कागज को खोल के दिखाया. उस कागज में बने चित्र को देख के मेरे बददिमाग, मतलबी बापू की आँखों में और गुस्सा आ गया, उनका हाथ जो अबतक कमजोर पड़ा था गुस्से में हल्का सा उठा और कागज की तरफ लपका, मैंने हलके से उनके हाथ को धक्का दिया वो वापस पहले की तरह लेट गए, मैं हैरान था की ये इंसान इस वक़्त भी ऐसा कर सकता है, फितरत ही अजीब होती है कायरों की. मैंने एक बार अपने हाथ में पकड़े कागज में बने उस चित्र को देखा और फिर एक झटके में उस चाकू को बापू के गले में पूरा उतार दिया.
उनकी साँसे वही थम गयी.
मकान का दरवाजा खुला और कई लोग अन्दर आ गए, मुझे याद नहीं की कौन क्या कह रहा था, मैं बस उस कागज को पकड़ के देखता रहा.
काला रंग जो की अँधेरा था, उसमे धंसा एक चाकू, ठीक उसके सामने एक औरत जिसके पंख रंग बिरंगे से, रौशनी उसके पास थी. अँधेरा मर चुका था और वो उड़ने जा रही थी, दूर बेवजह के बन्धनों से दूर, आजाद हवा में नयी चीजों के पास.

मुझे कोई शिकायत नहीं थी माँ से. हम सब यहाँ मतलबी हैं, अपने मतलब से ही रिश्ते रखते हैं. तो फिर माँ क्यूँ नहीं मतलबी हो सकती अपनी जिंदगी को जीने के लिए, और अगर बात अपने सपनों को पूरा करने की हो तो थोड़ा मतलबी और ढेर सारा जुनूनी होना बनता है.

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Sunday, 11 January 2015

" ज़िद मेँ "

वो बिखरने की ज़िद मेँ थी,
मैं समेटने की ज़िद मेँ था |

वो आज को खत्म करने की ज़िद में थी,
मैं कल को बचाने की जिद में था ।

वो मय से दर्द भुलाने की जिद में थी ,
मैं इश्क़ से दर्द मिटाने की ज़िद में था।

वो दैर -काबा से ऐतबार उठाने की ज़िद मेँ थी,
मैं आयतें पढ़ -पढ़ के ऐतबार दिलाने की ज़िद मेँ था ।

वो ताउम्र किसी का सहारा ना चाहने की ज़िद मेँ थी,
मैं ताउम्र सहारा ना बन साथ निभाने की ज़िद मेँ था ।

मय - शराब
दैर - मंदिर


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इस जगमगाती रोशनी में मुझे एक अँधेरा दिखता है, मुझे दिखता है वो शख्स जो बस रातों में बिकता है. पहले से बँटे   मेरे इस वतन को और बा...