Wednesday, 13 May 2015

कौन जाने

कौन जाने किसी बहाने से तुम मुझे पुकारती हो,
मैंने सुना है नींद में तुम तकिये से मुझे मारती हो ।

अरे ऐसी क्या बेबसी की आके थोड़ी चिट चैट ना कर सको,
वाकई जिद्दी हो या बस एवईं रुतबा झाड़ती हो ।

मैं पसंद हूँ तो, ज़रा मुझसे कहो,
ये क्या बार बार नज़रे मिला के मुझे ताड़ती हो ।

इतना भी क्या हिचकिचाना,
मन ही मन चाहना, बस बातें बनाना,
मुझको पता है ये रंग रूप मेरे लिए निखारती हो ।

चलो आज एक बात मैं भी कबूल करता हूँ,
हाँ मैं भी तुम्हें चाहता हूँ बेहद चाहता हूँ,
फिर क्यों नहीं एक बार बहाने की जगह हक़ से मुझे पुकारती हो ।

हर रात छत पे तुम्हारा इंतजार करता हूँ,
क्यों शर्मा जी के लड़के से हँस के बात करके मुझे जलन की कढ़ाई में उतारती हो ।


चलो ना किसी सुबह हम एक दूजे से वो कहें,
जिसे सुनने के बाद दिल में कोई तड़प ना रहे,
फिर देखना बस आने वाला हर लम्हा तुम मेरे साथ गुजारती हो ।

कौन जाने किसी बहाने से तुम मुझे पुकारती हो,
मैंने सुना है नींद में तुम तकिये से मुझे मारती हो ।

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