Tuesday, 9 September 2014

वहदत





जो वहदत थे इश्क़ में एक रात अलग हो गए ,

जहाँ हम हुआ करते थे वहाँ अब मैं हो गए।



वो चार दीदे एक नज़ारा  थीं,

तन्हा होने के बाद उनके नज़ारे भी बंजारे हो गए।



जहाँ सांसे , सिरहन , आहटें होती थीं दो जिस्मों की एक रूह बनने पर ,

वहाँ अब खामोशी, अदम, ज़ज्बात बस हवा हो गए।



शम्स , मेहताब सब लौट गये उस आशना से झाँक के ,

किसी गैर ने दरख़्तों की दरार से देखा तो पता चला दो जिस्म फंदे  के महबूस हो गए।



(वहदत - एक , दीदे - आँखे , अदम - शून्य, अभाव ,

शम्स - सूरज , मेहताब - चाँद , आशना - घर , दरख़्तों - दरवाजा , महबूस - बंदी  )

इस जगमगाती रोशनी में मुझे एक अँधेरा दिखता है, मुझे दिखता है वो शख्स जो बस रातों में बिकता है. पहले से बँटे   मेरे इस वतन को और बा...