जो वहदत थे
इश्क़ में एक
रात अलग हो
गए ,
जहाँ हम हुआ
करते थे वहाँ
अब मैं हो
गए।
वो चार दीदे
एक नज़ारा थीं,
तन्हा होने के
बाद उनके नज़ारे
भी बंजारे हो
गए।
जहाँ सांसे , सिरहन , आहटें
होती थीं दो
जिस्मों की एक
रूह बनने पर
,
वहाँ अब खामोशी,
अदम, ज़ज्बात बस
हवा हो गए।
शम्स , मेहताब सब लौट
गये उस आशना
से झाँक के
,
किसी गैर ने
दरख़्तों की दरार
से देखा तो
पता चला दो
जिस्म फंदे के महबूस
हो गए।
(वहदत - एक , दीदे
- आँखे , अदम - शून्य, अभाव
,
शम्स - सूरज , मेहताब - चाँद
, आशना - घर , दरख़्तों
- दरवाजा , महबूस - बंदी )