Tuesday, 19 December 2017

वो द्रश्य

सब तमाशबीन रहा सिवाय उस द्रश्य के,
मैं भी रहा, तुम भी रहे, वो सब भी रहे.

वो द्रश्य चीखता रहा रात के सन्नाटे में तेज हवाओं की तरह,
वो द्रश्य चलता रहा वक़्त के उन लम्हों की तरह जो जल्दी नहीं बीतते.

तुम बगले झाँकतें हुए चल दिए,
वो सब में से कुछ तुम्हारे साथ चल दिए,
मैं उस द्रश्य में बेशर्मों की तरह ठंडी रूह लिए कहानी, किस्सा ढूँढने की कोशिश करता रहा.

एक बार को खुद को बहादुर, हिम्मती भी सोचा,
पर असल में मैं कायर ही रहा.

फिर वो चीख, वो लम्हे सब थम गए,
मैं फिर भी तमाशबीन रहा,
वो द्रश्य भी तमाशबीन हो गया,
जो होना नहीं चाहिए था एक अस्मत के साथ वो भी हो गया.

धीरे धीरे जैसे मैं उस द्रश्य से चल दिया वैसे ही ये द्रश्य भी लोगों के दिमाग से चला जायेगा,
फिर कुछ बातें होंगी कुछ बयान आएंगे,
कुछ एक आध दिन पन्ने में वो द्रश्य चला आयेगा,
इन अँधेरी बुत सी तमाशबीन आँखों में उजाला करने धुंधली रोशनी लिए मोमबत्तियां जलेंगी,

अब, होगा कुछ नहीं,

फिर एक और द्रश्य आयेगा और वापस से हम सब तमाशबीन बन जायेंगे.

- v.p


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Friday, 3 March 2017

           “जरूरी होता है “


“तुम” से पहले “ मैं ” भी जरुरी होता है,
जो वक़्त होता है बुरा वो वक़्त भी जरूरी होता है.

यहाँ रह जाते हैं कई पेट भूखे जनाब,
क्यूंकि थाली में छप्पन भोग भी जरुरी होता है.

वो दूर ना जाए इसकी कोशिशें कई बार की,
पर मोहब्बत में दूर जाने का सबक भी जरूरी होता है.

वो बचाती फिरती है अपनी अस्मत हर एक मर्द से,
ऐ गनीज मर्दों ऐसा मर्द होना भी क्या जरूरी होता है ?

हो सके तो ख़ाक कर दो तिलक और टोपी के इन धर्मों को,
एक इंसा होने के लिए बस मोहब्बत का होना ही जरूरी होता है.

हर एक पास है यहाँ कहने को बहुत कुछ,
पर कहने के लिए सुनना भी जरूरी होता है.

कौन कहता है के बचपन अब टेक्नोलॉजी का मोहताज हो गया है,
गलियों में आज भी आई - स्पाई का “धप्पा” भी जरूरी होता है.

नहीं जानना चाहता के इन लफ्ज़ों के मायने हैं भी या नहीं,
कभी कभी मायनों से ज्यादा एहसास भी जरूरी होता है.

-v.p 

इस जगमगाती रोशनी में मुझे एक अँधेरा दिखता है, मुझे दिखता है वो शख्स जो बस रातों में बिकता है. पहले से बँटे   मेरे इस वतन को और बा...