सब
तमाशबीन रहा सिवाय उस द्रश्य के,
मैं
भी रहा, तुम भी रहे, वो सब भी रहे.
वो
द्रश्य चीखता रहा रात के सन्नाटे में तेज हवाओं की तरह,
वो
द्रश्य चलता रहा वक़्त के उन लम्हों की तरह जो जल्दी नहीं बीतते.
तुम
बगले झाँकतें हुए चल दिए,
वो
सब में से कुछ तुम्हारे साथ चल दिए,
मैं
उस द्रश्य में बेशर्मों की तरह ठंडी रूह लिए कहानी, किस्सा ढूँढने की कोशिश करता
रहा.
एक
बार को खुद को बहादुर, हिम्मती भी सोचा,
पर
असल में मैं कायर ही रहा.
फिर
वो चीख, वो लम्हे सब थम गए,
मैं
फिर भी तमाशबीन रहा,
वो
द्रश्य भी तमाशबीन हो गया,
जो होना
नहीं चाहिए था एक अस्मत के साथ वो भी हो गया.
धीरे
धीरे जैसे मैं उस द्रश्य से चल दिया वैसे ही ये द्रश्य भी लोगों के दिमाग से चला
जायेगा,
फिर
कुछ बातें होंगी कुछ बयान आएंगे,
कुछ
एक आध दिन पन्ने में वो द्रश्य चला आयेगा,
इन
अँधेरी बुत सी तमाशबीन आँखों में उजाला करने धुंधली रोशनी लिए मोमबत्तियां जलेंगी,
अब,
होगा कुछ नहीं,
फिर
एक और द्रश्य आयेगा और वापस से हम सब तमाशबीन बन जायेंगे.
- v.p
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