Sunday, 6 December 2015

              तुम क्या हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

ठंडक भरी तन्हा शाम हो ?
या तपते दिन की छाँव हो ?
बेमतलब सी हँसी हो ?
या सिसकियों की नमीं हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

एक आवारा अधूरा ख्याल हो ?
या मुकम्मल हकीक़त हो ?
अदना सा जर्रा भर हो ?
या पूरा जहाँ हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

सारे सवालों का जवाब हो ?
या खुद एक सवाल हो ?
दर्द की आह हो ?
या इन अल्फाजों की वाह हो ?

तुम क्या हो ?
कुछ तो कहो, आखिर तुम क्या हो ?

तुम “मैं “ भी हो,
तुम “तू” भी हो,
तुम “हम” भी हो,
तुम होके भी नहीं हो,
तुम होके भी हर कहीं हो,

तुम क्या हो ?

शायद तुम इश्क हो .






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