Friday, 14 November 2014


खामोश रात मेँ भी
आवाज़ थी बेहद,
तुम जो साथ थीँ
तो अधरोँ  को प्यास थी बेहद ।

हुस्न था तेरा या
जलता शोला,
तुझे छूते ही मेरे
सीने मेँ आग थी बेहद ।

मेरी ऊँगलियोँ कि
चाल से तुझमेँ भी
सिरहन हुई,
तुझमेँ भी मेरी
बाहोँ मेँ टूटने की
आरजू थी बेहद ।

तेरे चेहरे को थाम
जो मैँने लिए
बोसे कई,
तो पता चला तू
भी इश्क मेँ मेरे
निसार थी बेहद ।

इस मुलाकात से
पहले जो
वक्फे- हिर्मानो - यास
थी तुझमेँ ,
मेरी कश्ती को अपने समंदर मेँ लेते ही
सारी चीज़ेँ तेरे लिए नाचीज़ थीँ बेहद ।

हम हदीलोँ की तरह
एक दूजे पे हला
लूटाते रहे ,
तू मेरी जिस्त के लिए आफरीन थी
बेहद ।

तेरे खूबसूरत होटोँ
के आबशार को मैँ पीता रहा,
तेरी हर एक साँस
अब शरर
सी थी बेहद ।

तेरे समंदर के
सैलाब के उमड़ते
ही तू अकड़ती चली
 गई,
तेरे सैलाब के
टकराते ही मेरी
कश्ती मेँ अब लरज़ थी बेहद ।

ये रात तो सो गई,
हम जागते रहे,
अभी भी हमारे
क़फस मेँ कसक थी बेहद ।

इतनी कशीयदगी  के बाद
जब निढाल हुए हम
एक दूजे पे,
तो तेरे चेहरे पे
पेशानी की जगह
तस्कीन
थी बेहद ।

सहर आँख खुलने पे मेरी
उलफत मेँ
बिन मलबूस
के तू खूबसूरत थी
बेहद ,
मानो खुदा की सबसे मुसफ़्फ़ा
बनावट तू ही है बस ।

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