वो बिखरने की ज़िद मेँ थी,
मैं समेटने की ज़िद मेँ था |
वो आज को खत्म करने की ज़िद में थी,
मैं कल को बचाने की जिद में था ।
वो मय से दर्द भुलाने की जिद में थी ,
मैं इश्क़ से दर्द मिटाने की ज़िद में था।
वो दैर -काबा से ऐतबार उठाने की ज़िद मेँ थी,
मैं आयतें पढ़ -पढ़ के ऐतबार दिलाने की ज़िद मेँ था ।
वो ताउम्र किसी का सहारा ना चाहने की ज़िद मेँ थी,
मैं ताउम्र सहारा ना बन साथ निभाने की ज़िद मेँ था ।
मय - शराब
दैर - मंदिर
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मैं समेटने की ज़िद मेँ था |
वो आज को खत्म करने की ज़िद में थी,
मैं कल को बचाने की जिद में था ।
वो मय से दर्द भुलाने की जिद में थी ,
मैं इश्क़ से दर्द मिटाने की ज़िद में था।
वो दैर -काबा से ऐतबार उठाने की ज़िद मेँ थी,
मैं आयतें पढ़ -पढ़ के ऐतबार दिलाने की ज़िद मेँ था ।
वो ताउम्र किसी का सहारा ना चाहने की ज़िद मेँ थी,
मैं ताउम्र सहारा ना बन साथ निभाने की ज़िद मेँ था ।
मय - शराब
दैर - मंदिर
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I loved this one bro.
ReplyDeleteYou are blessed with words.
Keep it up Bhai.