Wednesday, 3 December 2014

सस्ती सी वो मस्ती चली गई,
जरा सी थी जो, वो हस्ती चली गई ।

विरानों में फिरते हैं अब,
मदरसे की वो बस्ती चली गई ।

यारों कि बज्म़ में जो लगते थे ठहाके और मिलती थीं गालियाँ,
अब तो वो ठहाके और गालियों की कश्ती भी चली गई ।

मदरसे- Schl, बज्म़ - mehfil

©. All Rights Reserved

2 comments:

  1. वाह भाई... मज़ा आ गया।।
    बहुत खूब।।

    ReplyDelete
  2. Thank u soo mch Vasu bhaiya apna time dene k liye
    Nd acha lga uske liye bhi dhanyavad :)

    ReplyDelete

इस जगमगाती रोशनी में मुझे एक अँधेरा दिखता है, मुझे दिखता है वो शख्स जो बस रातों में बिकता है. पहले से बँटे   मेरे इस वतन को और बा...